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Dussehra 2026 Traditions: प्रदोष काल में ही क्यों किया जाता है रावण दहन? जानिए इस धार्मिक परंपरा और मान्यता के पीछे का मुख्य कारण

विजयादशमी के पावन पर्व पर रावण दहन के लिए प्रदोष काल को सबसे उत्तम क्यों माना गया है? जानिए इसके पीछे छिपे पौराणिक और ज्योतिषीय रहस्य।

Dussehra 2026 Traditions: सनातन धर्म में विजयादशमी यानी दशहरा का पर्व असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देश भर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है। हालांकि, क्या आपने कभी सोचा है कि रावण दहन हमेशा संध्या काल यानी ‘प्रदोष काल’ में ही क्यों किया जाता है? आइए जानते हैं इस प्राचीन परंपरा के पीछे की धार्मिक मान्यता और ज्योतिषीय कारण।

प्रदोष काल का धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, सूर्य अस्त होने के तुरंत बाद के करीब ढाई घंटे के समय को ‘प्रदोष काल’ कहा जाता है। शास्त्रों में इस काल को बेहद पवित्र और ऊर्जावान माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध इसी संध्या बेला में किया था। इसलिए असत्य के प्रतीक रावण के अंत का स्मरण करते हुए उसी समय पर पुतला दहन की परंपरा चली आ रही है।

ज्योतिषीय और असुरी शक्तियों का नाश

ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार, प्रदोष काल वह समय होता है जब दिन और रात का मिलन होता है। ऐसा माना जाता है कि इस बेला में नकारात्मक और असुरी शक्तियां सबसे अधिक सक्रिय होती हैं। रावण को अहंकार और बुराई का प्रतीक माना गया है, और संध्या के समय उसका दहन इस बात का संदेश देता है कि अहंकार का पतन निश्चित है। इसके अलावा, विजयादशमी के दिन बिना किसी मुहूर्त को देखे भी किसी भी नए कार्य की शुरुआत की जा सकती है, क्योंकि इस तिथि को ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है।

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