अटैचमेंट टूटने से बस्तर की पोटा केबिन शालाओं में मचा हड़कंप: 32 हजार आदिवासी बच्चों की पढ़ाई पर संकट; बिना ‘सेटअप’ कैसे संभलेगी व्यवस्था?
कार्यालयों से शिक्षकों को हटाने की प्रशासनिक सर्जरी तो हुई, लेकिन संवेदनशील आवासीय शालाओं में खड़ा हुआ स्टाफ का गंभीर संकट

जगदलपुर/रायपुर, 4 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में संवेदनशील और सुदूर वनांचल क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए संचालित की जा रही पोटा केबिन (पोर्टेबल आवासीय शालाएं) इस समय एक बड़े प्रशासनिक संकट के मुहाने पर खड़ी हो गई हैं। राज्य शासन के कड़े निर्देश के बाद बस्तर संभाग में वर्षों से विभिन्न कार्यालयों और गैर-शैक्षणिक मलाईदार कुर्सियों पर जमे शिक्षकों और कर्मचारियों का संलग्नीकरण (अटैचमेंट) समाप्त कर दिया गया है।
प्रशासन की इस बड़ी और सराहनीय कार्रवाई के बाद सभी अटैच अध्यापकों को तत्काल प्रभाव से उनके मूल विद्यालयों में भेज दिया गया है, लेकिन इस बड़े प्रशासनिक सुधार ने बस्तर की विशेष पोटा केबिन शालाओं के सामने एक नया और गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। स्वीकृत ‘सेटअप’ न होने के कारण यहाँ पढ़ रहे 32 हजार से अधिक आदिवासी बच्चों की व्यवस्था और सुरक्षा अब पूरी तरह भगवान भरोसे नजर आ रही है।
क्यों गहराया पोटा केबिन शालाओं में संकट?
बस्तर के नक्सल प्रभावित और अंदरूनी इलाकों में बच्चों को सुरक्षित माहौल में रखकर पढ़ाने के लिए पोटा केबिन आवासीय विद्यालय शुरू किए गए थे। इन शालाओं की जमीनी हकीकत को समझना जरूरी है:
स्वीकृत सेटअप का अभाव: पोटा केबिन शालाओं के संचालन के लिए शुरुआत से ही कोई स्वतंत्र या स्थायी स्वीकृत प्रशासनिक और शैक्षणिक सेटअप (पद) नहीं बनाया गया है।
अटैचमेंट के भरोसे संचालन: अब तक इन आवासीय शालाओं में बच्चों की देखरेख, अधीक्षकों के दायित्व और शिक्षण कार्य के लिए अन्य सामान्य स्कूलों के शिक्षकों को ‘संलग्नीकरण’ (अटैचमेंट) के माध्यम से तैनात किया जाता था।
अचानक स्टाफ गायब: जिला प्रशासन द्वारा एकमुश्त सभी अटैचमेंट निरस्त किए जाने के कारण पोटा केबिनों में तैनात शिक्षक और कर्मचारी भी अपनी मूल शालाओं में लौट गए हैं। इसके चलते इन संवेदनशील आवासीय परिसरों में अचानक स्टाफ का भारी वैक्यूम (शून्यता) पैदा हो गया है।
32 हजार बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई दांव पर
बस्तर संभाग की इन पोर्टेबल आवासीय शालाओं में वर्तमान में लगभग 32 हजार से अधिक आदिवासी छात्र-छात्राएं रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। मानसून के इस मौसम में जब अंदरूनी इलाकों में मौसमी बीमारियों और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, तब इन शालाओं से स्टाफ का हट जाना बेहद चिंताजनक है:
अधीक्षकों और सहायकों की कमी: बिना किसी जिम्मेदार स्टाफ के बच्चों के रहने, खाने-पीने और उनकी सुरक्षा की मॉनिटरिंग करना पोटा केबिनों के लिए असंभव होता जा रहा है।
पढ़ाई पूरी तरह ठप: जो शिक्षक पोटा केबिनों में नियमित कक्षाएं ले रहे थे, उनके चले जाने से आदिवासी बच्चों का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है।
प्रशासनिक असमंजस: स्थानीय अधिकारियों के सामने यह बड़ी चुनौती है कि शासन के आदेश का पालन करते हुए अटैचमेंट तो खत्म कर दिया गया, लेकिन पोटा केबिनों को बिना स्टाफ के कैसे जिंदा रखा जाए।
वैकल्पिक व्यवस्था की उठ रही मांग
शिक्षाविदों और स्थानीय जागरूक नागरिकों का कहना है कि दफ्तरों की मलाईदार कुर्सियों पर बैठे शिक्षकों को हटाकर मूल शालाओं में भेजना एक बेहतरीन कदम है, लेकिन पोटा केबिन जैसी संवेदनशील और विशेष श्रेणी की आवासीय व्यवस्था को इस नियम से अलग रखा जाना चाहिए था या इनके लिए पहले से विशेष भर्ती कर वैकल्पिक स्टाफ की व्यवस्था की जानी चाहिए थी।
यदि सरकार ने जल्द ही पोटा केबिन शालाओं के लिए किसी विशेष सेटअप या मानदेय आधारित विशेष नियुक्तियों की घोषणा नहीं की, तो बस्तर के संवेदनशील अंचलों में शिक्षा का यह सबसे सफल मॉडल पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है।



