छत्तीसगढ़

Jagdalpur News: छत्तीसगढ़ में UCC पर आदिवासी अधिकारों का सवाल, सर्व आदिवासी समाज ने केंद्र और राज्य सरकार से सात बिंदुओं पर मांगा जवाब

Jagdalpur News: देश में समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रारूप को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में इसको लेकर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों, विशिष्ट पहचान और परंपरागत व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। शुक्रवार को जगदलपुर में यूसीसी के प्रारूप पर चर्चा के लिए आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सर्व आदिवासी समाज ने कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र और राज्य सरकार से सात प्रमुख बिंदुओं पर लिखित जवाब मांगा है। समाज का कहना है कि यूसीसी लागू होने से आदिवासियों की रूढ़िगत प्रथाएं और विशेष संवैधानिक संरक्षण खतरे में पड़ सकते हैं।

जिला कलेक्टोरेट परिसर स्थित प्रेरणा हॉल में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान शुरुआती क्षणों में ही माहौल उस समय तनावपूर्ण हो गया जब समाज के कुछ प्रतिनिधियों को प्रवेश द्वार पर सूची में नाम न होने का हवाला देकर अंदर जाने से रोक दिया गया। इस प्रशासनिक पाबंदी के बाद कलेक्टोरेट परिसर में जमकर हंगामा हुआ और नाराज प्रतिनिधियों ने बाहर ही यूसीसी के विरोध में जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। हालांकि, कुछ ही देर बाद वरिष्ठ अधिकारियों के तत्काल हस्तक्षेप और समझाइश के बाद स्थिति को संभाला गया और सभी संबंधित प्रतिनिधियों को बैठक कक्ष में प्रवेश दिया गया, जिससे लगभग 10 मिनट तक चली गहमागहमी शांत हुई।

इस उच्चस्तरीय बैठक में यूसीसी प्रारूप समिति के अध्यक्ष एम.के. राऊत, सदस्य मोहन सिंह पवार और ज्योति रानी सिंह, समिति के सचिव श्याम धावड़े तथा बस्तर संभागायुक्त डोमन सिंह प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। प्रशासनिक अधिकारियों ने सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उनके द्वारा उठाए गए संवैधानिक बिंदुओं पर चर्चा की। समाज के नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि पांचवीं अनुसूची और संविधान के अन्य सुरक्षात्मक प्रावधानों के तहत आदिवासियों को मिले अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

सर्व आदिवासी समाज द्वारा रखे गए सात प्रमुख बिंदुओं में मुख्य रूप से रूढ़िगत कानूनों, विवाह, उत्तराधिकार, और पारंपरिक ग्राम सभाओं के अधिकारों के संरक्षण का मुद्दा शामिल है। प्रतिनिधियों का तर्क है कि आदिवासी संस्कृति देश की अन्य सामान्य आबादी से पूरी तरह भिन्न है और उनकी अपनी विशिष्ट न्याय प्रणाली व सामाजिक रीति-रिवाज हैं, जिन्हें यूसीसी के दायरे में लाने से उनकी सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है। समाज ने सरकार से यह मांग की है कि वह इन बिंदुओं पर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करे।

बैठक के दौरान समिति के अधिकारियों ने समाज के प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया कि उनके सुझावों और आपत्तियों को पूरी गंभीरता से दर्ज किया जा रहा है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर संबंधित उच्चाधिकारियों व आयोग तक पहुंचाया जाएगा। सरकार का उद्देश्य सभी पक्षों की राय जानकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना है, ताकि किसी भी समुदाय के मौलिक और पारंपरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

इस विरोध प्रदर्शन और उच्चस्तरीय बैठक के बाद बस्तर के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि यूसीसी पर जनजातीय समाज की आपत्तियां आने वाले समय में एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती हैं। फिलहाल प्रशासन और आदिवासी प्रतिनिधियों के बीच हुई इस चर्चा के बाद आगे की बैठकों और वार्ताओं पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।

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