Bastar Report:पीड़ित बनकर आए, जमीन मिली… अब परलकोट में किसका बढ़ रहा है दबदबा? DNK की कहानी में आदिवासी कहां छूट गए?
परलकोट की DNK परियोजना ने विस्थापित परिवारों को बसाया, लेकिन सात दशक बाद जमीन, संसाधनों और स्थानीय प्रतिनिधित्व के बदलते समीकरण कई सवाल खड़े करते हैं।

Bastar Report पखांजूर/परलकोट। दंडकारण्य विकास परियोजना (DNK) का इतिहास भारत के विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों के पुनर्वास से जुड़ा है। पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए हजारों परिवारों को नया जीवन देने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में जमीन, गांव और खेती की व्यवस्था विकसित की गई। लेकिन करीब सात दशक बाद परलकोट की यही विरासत अब जमीन, संसाधनों और स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर कई सवाल खड़े करती है।
यह सवाल किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि जिस परियोजना में विस्थापितों के पुनर्वास के साथ स्थानीय आदिवासी आबादी के हितों को भी उद्देश्य का हिस्सा माना गया था, उसका मौजूदा प्रभाव क्या है। आज जरूरत इस बात की है कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड और वर्तमान राजस्व दस्तावेजों के आधार पर यह पता लगाया जाए कि समय के साथ जमीन के स्वामित्व और स्थानीय सामाजिक-राजनीतिक समीकरण किस तरह बदले।
पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापन के बाद दंडकारण्य में मिला नया ठिकाना
1947 के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू परिवार भारत पहुंचे। इनके पुनर्वास के लिए 1958 में दंडकारण्य विकास प्राधिकरण की स्थापना की गई। परियोजना का विस्तार तत्कालीन मध्यप्रदेश और ओडिशा के आदिवासी बहुल क्षेत्रों तक हुआ। इसका उद्देश्य विस्थापित परिवारों को बसाने के साथ क्षेत्र के विकास और स्थानीय आबादी के हितों को बढ़ावा देना भी था।
परलकोट इस पुनर्वास कार्यक्रम के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल रहा। पखांजूर, कापसी और बांदे क्षेत्र में PV-1 से PV-133 तक 133 पुनर्वास गांव बसाए गए। इस प्रक्रिया ने क्षेत्र के सामाजिक और भौगोलिक स्वरूप में बड़ा बदलाव किया। जंगल और पहले से मौजूद बस्तियों के बीच नए गांव, कृषि भूमि और पुनर्वास कॉलोनियां विकसित हुईं।
हजारों परिवारों के लिए विकसित की गई जमीन
ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार परलकोट क्षेत्र में करीब 50,399 एकड़ भूमि विकसित या क्लियर की गई और लगभग 11,248 परिवारों का पुनर्वास किया गया। इन आंकड़ों के आधार पर प्रति परिवार औसतन करीब 4.48 एकड़ विकसित भूमि का अनुपात निकलता है। हालांकि DNK की भूमि आवंटन व्यवस्था अलग-अलग चरणों में बदलती रही। कुछ दस्तावेजों में कृषि परिवार के लिए 6.5 एकड़ कृषि भूमि और 0.5 एकड़ आवास या बाड़ी का प्रावधान मिलता है, जबकि वास्तविक आवंटन कई मामलों में इससे अलग रहा।
यही वजह है कि आज की स्थिति समझने के लिए केवल ऐतिहासिक आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। मूल DNK रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, खसरा-बी1 और भूमि के वर्तमान नक्शों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी होगा।
सात दशक में बदली सामाजिक और आर्थिक तस्वीर
पुनर्वास के बाद यहां बसे परिवारों की कई पीढ़ियां अब परलकोट में ही जन्मी और पली-बढ़ी हैं। समय के साथ खेती के अलावा कारोबार, शिक्षा और स्थानीय संस्थाओं में उनकी भागीदारी भी बढ़ी। इसी दौरान क्षेत्र में अलग-अलग समुदायों के बीच सामाजिक और वैवाहिक संबंध भी विकसित हुए, जिससे स्थानीय सामाजिक संरचना पहले की तुलना में अधिक जटिल हुई।
लेकिन इस बदलाव के बीच कुछ महत्वपूर्ण सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। क्या मूल आवंटन के बाद कुछ परिवारों के पास अतिरिक्त जमीन पहुंची? क्या सरकारी या वन भूमि पर बाद के वर्षों में अतिक्रमण हुए? क्या आदिवासी परिवारों की जमीन का हस्तांतरण किसी दबाव, आर्थिक मजबूरी या अन्य परिस्थितियों में हुआ? और क्या बदलती सामाजिक संरचना का असर पंचायत से लेकर जनपद स्तर की राजनीति पर पड़ा?
इन सवालों का जवाब किसी धारणा या समुदाय आधारित आरोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजी जांच से ही मिल सकता है।
जमीन से आगे स्थानीय सत्ता का सवाल
परलकोट में राजनीतिक प्रभाव को केवल जातीय या सामुदायिक पहचान के आधार पर समझना भी पर्याप्त नहीं होगा। पंचायत चुनाव, जनपद प्रतिनिधित्व, स्थानीय संस्थाओं में भागीदारी और लंबे समय के चुनावी आंकड़े यह बता सकते हैं कि पिछले सात दशकों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सामाजिक आधार किस तरह बदला।
इसी तरह जमीन के मामले में भी वर्तमान स्थिति जानने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि DNK के शुरुआती लाभार्थियों और उनके उत्तराधिकारियों के नाम आज कितनी भूमि दर्ज है। इसके साथ ही उन क्षेत्रों की भी जांच आवश्यक है जहां सरकारी, वन या अन्य श्रेणी की भूमि के स्वामित्व और उपयोग में समय के साथ बदलाव आया है।
DNK का मूल उद्देश्य और आज की चुनौती
DNK की कहानी को केवल विस्थापित परिवारों के पुनर्वास तक सीमित करना अधूरा होगा। एक ओर वे परिवार हैं जिन्होंने विभाजन और विस्थापन का दर्द झेला और पुनर्वास नीति के तहत परलकोट में अपना नया जीवन शुरू किया। दूसरी ओर इस क्षेत्र के पारंपरिक निवासी आदिवासी समुदाय हैं, जिनके सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश में इतनी बड़ी पुनर्वास परियोजना लागू की गई।
इसलिए आज का मूल सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन बाहर से आया और कौन स्थानीय था। असली सवाल यह है कि सात दशक बाद जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय प्रतिनिधित्व का वास्तविक वितरण क्या है।
रिकॉर्ड से सामने आ सकती है परलकोट की असली तस्वीर
यदि 1958 से अब तक के DNK दस्तावेज, मूल भूमि आवंटन रिकॉर्ड, वर्तमान खसरा-बी1, भूमि नक्शे, वन भूमि से जुड़े अभिलेख और पंचायत चुनावों के आंकड़ों का एक साथ अध्ययन किया जाए तो तस्वीर कहीं अधिक स्पष्ट हो सकती है।
किस परिवार को शुरुआत में कितनी जमीन मिली? आज वह जमीन किसके नाम दर्ज है? किन क्षेत्रों में भूमि का स्वरूप बदला? क्या सरकारी या वन भूमि पर बाद में कब्जे हुए? आदिवासी परिवारों की भूमि की स्थिति क्या रही? और स्थानीय सत्ता में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी किस तरह बदली?
इन सवालों की तथ्यात्मक पड़ताल ही तय करेगी कि परलकोट की DNK विरासत केवल विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की सफलता-कहानी है या इसके साथ भूमि, संसाधनों और स्थानीय सत्ता के बदलते समीकरणों की एक दूसरी कहानी भी जुड़ी हुई है।



