The Mindblowing True Story of UNO: बेटे से रोज-रोज के लड़ाई-झगड़े से तंग आकर एक नाई ने बनाया था यह गेम; दिलचस्प है इसके आविष्कार की कहानी
क्रेजी एट्स (Crazy Eights) के नियमों पर बहस से शुरू हुआ विवाद; कबाड़ बेचने से लेकर दुनिया का सबसे लोकप्रिय कार्ड गेम बनने तक का सफर

Raipur 9 जुलाई 2026। आज के समय में ‘UNO’ दुनिया के सबसे लोकप्रिय और पसंदीदा कार्ड गेम्स में से एक है। गेट-टुगेदर हो, दोस्तों की पार्टी हो या फिर फैमिली वेकेशन, इसके बिना हर महफिल अधूरी लगती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि करोड़ों दिलों पर राज करने वाले इस मजेदार गेम का आविष्कार किसी बड़ी खिलौना कंपनी या गेमिंग एक्सपर्ट ने नहीं, बल्कि अमेरिका के ओहायो (Ohio) में रहने वाले एक साधारण नाई (Barber) ने किया था? और इसके पीछे की वजह कोई बिजनेस आइडिया नहीं, बल्कि उनके घर में बेटे के साथ होने वाला रोज-रोज का लड़ाई-झगड़ा था।
क्रेजी एट्स (Crazy Eights) के नियमों पर बहस से शुरू हुई कहानी
यह दिलचस्प कहानी साल 1971 की है। ओहायो के सिनसिनाटी में रहने वाले नाई मर्ल रॉबिंस (Merle Robbins) अपने परिवार के साथ अक्सर ताश का एक पारंपरिक खेल ‘क्रेजी एट्स’ (Crazy Eights) खेला करते थे।
रोज का झगड़ा: इस खेल को खेलते समय मर्ल रॉबिंस और उनके बेटे के बीच गेम के नियमों को लेकर अक्सर तीखी बहस और लड़ाई-झगड़ा हो जाता था। दोनों के पास नियमों को लेकर अपने-अपने तर्क होते थे।
समस्या का समाधान: रोज-रोज की इस पारिवारिक कलह और बहस से तंग आकर मर्ल रॉबिंस ने एक अनोखा रास्ता निकालने की सोची। उन्होंने तय किया कि वह एक ऐसा नया गेम तैयार करेंगे जिसके नियम बिल्कुल साफ और कार्ड्स पर ही लिखे हों, ताकि बहस की कोई गुंजाइश ही न बचे।
घर के डाइनिंग टेबल पर तैयार हुआ ‘UNO’
मर्ल रॉबिंस ने अपने डाइनिंग टेबल पर बैठकर ताश के पत्तों के बुनियादी सिद्धांतों को बदला और खुद के नए नियम तैयार किए। उन्होंने कार्ड्स को रंग-बिरंगा बनाया और उन पर विशेष निर्देश (जैसे- Skip, Reverse, Draw Two) लिख दिए। जब उन्होंने इस नए गेम को अपने परिवार के साथ खेला, तो जादू हो गया—लड़ाई-झगड़े पूरी तरह बंद हो गए और खेल बेहद मनोरंजक हो गया। उन्होंने इतालवी और स्पेनिश भाषा के शब्द ‘वन’ (One) से प्रेरित होकर इस गेम का नाम ‘UNO’ रखा।
कबाड़ और घर बेचकर जुटाए पैसे, छपवाए पहले 5000 कार्ड्स
जब मर्ल के रिश्तेदारों और उनके सैलून में आने वाले ग्राहकों ने इस गेम को खेला, तो वे इसके दीवाने हो गए। खेल की बढ़ती लोकप्रियता को देख मर्ल ने इसे व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारने का फैसला किया, लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे।
लिया बड़ा जोखिम: मर्ल रॉबिंस ने इस गेम के पहले 5,000 सेट छपवाने के लिए अपने जीवन की जमा-पूंजी लगा दी, यहाँ तक कि उन्होंने अपना घर भी गिरवी रख दिया।
सैलून और कबाड़ के जरिए बिक्री: शुरुआत में वह इन कार्ड्स को अपने नाई की दुकान (सैलून) में आने वाले ग्राहकों को बेचते थे। धीरे-धीरे यह गेम इतना पसंद किया जाने लगा कि इसकी मांग तेजी से बढ़ने लगी।
इंटरनेशनल ब्रांड बनना और मटैलिक (Mattel) द्वारा अधिग्रहण
मर्ल रॉबिंस के इस गेम की क्षमता को एक स्थानीय व्यवसायी और यूएनओ के प्रशंसक रॉबर्ट टियाक ने पहचाना। साल 1972 में, मर्ल ने यूएनओ के अधिकार रॉबर्ट टियाक को महज 50,000 डॉलर और प्रति गेम 10 सेंट की रॉयल्टी पर बेच दिए। इसके बाद यह गेम एक अंतरराष्ट्रीय सनसनी बन गया। बाद में, दुनिया की दिग्गज खिलौना निर्माता कंपनी मटैलिक (Mattel) ने इसका अधिग्रहण कर लिया और आज यह दुनिया के 80 से अधिक देशों में खेला जाता है।
एक पिता-पुत्र के बीच खेल के नियमों की बहस से उपजा यह छोटा सा विचार आज वैश्विक गेमिंग इतिहास का एक सुनहरी पन्ना बन चुका है, जो हमें सिखाता है कि कभी-कभी रोजमर्रा की समस्याएं भी एक क्रांतिकारी आविष्कार को जन्म दे सकती हैं।



