छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में ‘गजराज’ का कुनबा भारी बढ़ा, अब आधुनिक तकनीक से होगी हाथियों की मॉनिटरिंग

रायपुर की नेशनल वर्कशॉप में वन मंत्री केदार कश्यप का बड़ा बयान— 4 साल में 240 से 450 पहुंचे हाथी, इंसानों की सुरक्षा के लिए बनेगा स्पेशल वैज्ञानिक मॉडल

रायपुर। छत्तीसगढ़ में हाथियों के संरक्षण, सुरक्षा और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन को मजबूत करने के लिए एक दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसका वर्चुअल शुभारंभ वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने किया। इस कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से आए वन्यजीव विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, पशु चिकित्सकों और वन अधिकारियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन मंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है और पिछले कुछ वर्षों में सरकार के संरक्षण प्रयासों के कारण प्रदेश में हाथियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2022 में जहां हाथियों की संख्या लगभग 240 थी, वह वर्ष 2026 में बढ़कर करीब 450 तक पहुंच गई है।

हाथियों का विचरण अब सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, रायपुर और दुर्ग संभाग के कई क्षेत्रों तक फैल चुका है, जिसे देखते हुए राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीणों की सुरक्षा को भी अपनी शीर्ष प्राथमिकता मान रही है। मंत्री कश्यप ने बताया कि सरकार जनभागीदारी, आधुनिक तकनीक, सतत निगरानी और प्रशिक्षित मानव संसाधन के माध्यम से मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए दीर्घकालिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर काम कर रही है। यह कार्यशाला वन अधिकारियों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले अमले को नवीनतम वैज्ञानिक जानकारी तथा व्यावहारिक अनुभव प्रदान कर वन्यजीव प्रबंधन को और अधिक सुदृढ़ बनाएगी।

इस राष्ट्रीय कार्यशाला में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) देहरादून और भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) बरेली जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हुए हैं। कार्यशाला के दौरान वन अधिकारियों और पशु चिकित्सकों को हाथियों की मृत्यु के कारणों की वैज्ञानिक जांच, नमूनों के उचित संरक्षण, परीक्षण प्रक्रियाओं, शव प्रबंधन (Post-mortem management) और हाथियों की स्वास्थ्य निगरानी जैसे संवेदनशील व महत्वपूर्ण विषयों पर गहन प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वन मंत्री ने उम्मीद जताई कि विशेषज्ञों के इन अनुभवों से छत्तीसगढ़ वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व (Co-existence) के क्षेत्र में एक मजबूत मॉडल के रूप में उभरेगा।

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