छत्तीसगढ़

नवा रायपुर में पुनर्वास फ्लॉप! चार दिन भी नहीं टिके नकटी के विस्थापित, फ्लैट छोड़ वापस लौटे गांव; प्रशासन की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

सोमवार को सेक्टर-30 के EWS फ्लैटों में किया गया था शिफ्ट, बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते गुरुवार को वापस लौटे ग्रामीण

रायपुर, 3 जुलाई 2026। राजधानी रायपुर के सम्मानपुर नकटी गांव से हटाए गए विस्थापित परिवारों के पुनर्वास (Rehabilitation) को लेकर जिला प्रशासन और एनआरडीए (NRDA) की तैयारियों की पोल खुल गई है। सोमवार को भारी प्रशासनिक मुस्तैदी के बीच जिन विस्थापित परिवारों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 स्थित ईडब्ल्यूएस (EWS) फ्लैटों में शिफ्ट किया गया था, उनमें से अधिकांश परिवार महज चार दिन के भीतर यानी गुरुवार तक फ्लैटों को छोड़कर वापस अपने मूल गांव नकटी लौट आए हैं।

विस्थापितों के इस तरह अचानक फ्लैट छोड़कर वापस लौटने से शासन-प्रशासन की पुनर्वास व्यवस्था और दावों पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

क्यों चार दिन भी नहीं टिक पाए विस्थापित ग्रामीण?

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने उन्हें नकटी गांव से बेदखल तो कर दिया, लेकिन नवा रायपुर के फ्लैटों में शिफ्ट करने से पहले वहां बुनियादी जरूरतें भी सुनिश्चित नहीं की गईं। ग्रामीणों ने वापस लौटने के पीछे कई गंभीर कारण बताए हैं:

बुनियादी सुविधाओं का अभाव: फ्लैटों में पीने के साफ पानी, बिजली सप्लाई और प्रॉपर ड्रेनेज (निकासी) की भारी समस्या थी।

रोजगार का संकट: ग्रामीण इलाकों में रहने वाले इन विस्थापितों के मवेशियों (पशुधन) को रखने और उनके चारे-पानी के लिए फ्लैटों में कोई जगह नहीं थी। इसके अलावा अचानक शहरी परिवेश में आने से उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया।

अधूरा निर्माण: कुछ विस्थापितों ने शिकायत की कि उन्हें जो फ्लैट आवंटित किए गए, उनमें खिड़की-दरवाजे और टॉयलेट के काम भी ठीक से पूरे नहीं हुए थे।

पुनर्वास व्यवस्था की खुली पोल

सोमवार को जब प्रशासन ने नकटी गांव से इन परिवारों को हटाया था, तब बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि विस्थापितों को नवा रायपुर में सर्वसुविधायुक्त पक्के मकान दिए जा रहे हैं। लेकिन हकीकत यह रही कि बिना ठोस कार्ययोजना और जमीनी तैयारियों के किए गए इस विस्थापन के कारण ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मजबूरन, वे फ्लैटों की चाबियां छोड़कर अपनी गृहस्थी का सामान समेटकर वापस नकटी गांव की सीमा पर आकर डट गए हैं।

ग्रामीणों की मांग – “जमीन के बदले मिले जमीन”: वापस लौटे ग्रामीणों का कहना है कि वे फ्लैटों के बंद कमरों में घुट-घुट कर नहीं रह सकते। उनकी मांग है कि सरकार उनके पुनर्वास के लिए ग्रामीण परिवेश के अनुकूल ही जमीन का टुकड़ा आवंटित करे, ताकि वे अपने मवेशियों को रख सकें और खेती-मजदूरी कर अपना जीवनयापन कर सकें।

प्रशासनिक अमले में मची खलबली

विस्थापितों के वापस गांव लौटने की खबर मिलते ही प्रशासनिक हलके में खलबली मच गई है। इस संवेदनशील मुद्दे पर अब स्थानीय राजनीति भी गरमाने लगी है। विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन की इस ‘जल्दबाजी’ और ‘असंवेदनशील’ कार्रवाई की निंदा करते हुए विस्थापितों को तत्काल सम्मानजनक और मुकम्मल व्यवस्था देने की मांग की है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इन परिवारों को दोबारा मनाने और सुविधाएं दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठाता है।

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