Feature

मांग जायज़, मंच गलत? सोनम वांगचुक के आंदोलन में ‘विवादित चेहरों’ की एंट्री से बिखरा जनसमर्थन

पर्यावरण और हिमालय संरक्षण के मूल मुद्दे से भटका लद्दाख आंदोलन; मंच से सनातन, हिंदू देवी-देवताओं और संत प्रेमानंद महाराज पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के आरोप, देशविरोधी नारेबाजी पर घिरे आयोजक

मैं आज भी सोनम वांगचुक की उन मांगों का समर्थन करता हूँ जो पर्यावरण संरक्षण, हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा और स्थानीय लोगों के अधिकारों से जुड़ी हैं। छात्र की मागो को लेकर है, यदि कोई मांग संविधान और जनहित के अनुरूप है, तो उस पर गंभीरता से विचार भी होना चाहिए।

लेकिन प्रश्न यह है कि किसी भी जनआंदोलन की विश्वसनीयता उसके मंच, उसके संदेश और उससे जुड़ने वाले लोगों से भी तय होती है। यह आंदोलन स्वयं करते तो लोग समर्थन भी करते हैं पर उसके आंदोलन के पीछे एक और जहां कॉकरोच है तो दूसरी ओर टुकड़े टुकड़े के तीसरी और हिंदू हिंदुस्तान को गाली देने वाले लोग तो चौथी और देवी देवताओं का अपमान करने वाले लोग और अंत में वे सभी लोग जो दुनिया में हिंदुस्तान व सनातन को बदनाम करने के लिए तुले हुए हैं।

यदि किसी आंदोलन के दौरान हिंदू धर्म के खिलाफ नारे लगाए जाये ,ऐसे नारे लगाए जाएँ ,हमारे आराध्य के खिलाफ जहर उगले, सनातन को बदनाम किया जाए, देशद्रोही उमर खालिद के समर्थन में नारे लगे पोस्टर लगे, स्वरा भास्कर, प्रकाश राज, अरुंधति राय योगेंद्र यादव, संजय सिंह ,अरविंद केजरीवाल ,का जुड़ना व ऐसे वक्तव्य दिए जाएँ जो धार्मिक भावनाओं को आहत करें, किसी समुदाय या आस्था का अपमान करें, अथवा आंदोलन का केंद्र बिंदु मूल मुद्दे से हटाकर वैचारिक या राजनीतिक टकराव बना दें, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं। ऐसे आरोप भी सामने आए कि कुछ वक्ताओं ने हिंदू देवी-देवताओं और संत प्रेमानंद महाराज के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं तथा कुछ विवादित व्यक्तियों के समर्थन में नारे लगे। यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

जब किसी आंदोलन के मंच पर विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े विवादित चेहरे प्रमुखता से दिखाई देने लगते हैं हिंदू सनातन ब्राह्मण व देश विरोधी एजेंडा चलाने वाले हावी वो जाए , तब यह आशंका भी जन्म लेती है कि कहीं आंदोलन का मूल उद्देश्य पीछे तो नहीं छूट रहा। इससे जनसमर्थन प्रभावित हो सकता है, क्योंकि लोग मुद्दे से अधिक मंच और उसके संदेश को देखने लगते हैं।

यदि सोनम वांगचुक का उद्देश्य केवल अपने मूल मुद्दों पर जनसमर्थन जुटाना है, तो उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि उनका आंदोलन किसी धर्म, किसी समुदाय या किसी राजनीतिक दल के समर्थन अथवा विरोध का मंच नहीं है। ऐसा स्पष्ट संदेश आंदोलन की विश्वसनीयता को मजबूत करेगा।

दूसरी ओर, सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतंत्र में संवाद सबसे प्रभावी माध्यम होता है। यदि किसी जनआंदोलन की मांगें गंभीर हैं, तो सरकार को संवाद के द्वार खुले रखने चाहिए। लंबे समय तक मौन या संवादहीनता से समाधान नहीं निकलता, बल्कि अविश्वास बढ़ता है।

अंततः मेरी दृष्टि में बात सीधी है—मांग यदि जनहित में है तो उसका समर्थन होना चाहिए, लेकिन आंदोलन का मंच भी उतना ही संयमित, मर्यादित और मूल उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। वांगचुंग का मंच पूरी तरह उन्हीं लोगों के हाथ में चला गया है जिन्होंने समय पर देश में देश विरोधी नारे लगाए देश तोड़ने की बात की लाल किले तक में हमले कराए सालों साल किसानों के नाम पर सड़कों को जमकर कोहराम मचाया दिल्ली में आंदोलन के नाम पर दिल्ली को दंगों में झोंका और यही कारण है कि वंशु के आंदोलन से एक बड़ा वर्ग जो शुरू में समर्थन करने आया था वह एक-एक कर अलग हो गए।

जनहित का आंदोलन तभी सफल होता है, जब उसका केंद्र केवल जनहित रहे, न कि राजनीतिक अवसरवाद।

(मनोज शुक्ला)

 

Related Articles

Back to top button